Wednesday, 21 December 2016

रोज़ रोज़ तकिया कहाँ से पलटते? 
वो तो अच्छा है आंसुओं के निशाँ नहीं पड़ते।

Thursday, 8 December 2016

काश के मैं भी "श" को "फ" बोलती..
कम से कम "शनि की दशा" सुनने में तो अच्छा लगता। 
कभी तो मीलों चलते हुए भी नहीं थकते है,
और कभी अगले दिन तक पहुंचना भी मुश्किल हो जाता है. 

Thursday, 1 December 2016



अनजान शहर की भीड़ में कभी कभी
माँ बाप का चेहरा दिख जाता है,
लगता है, देख रहे हैं की मैं ठीक हूँ या नहीं
मैं भी देख लेती हूँ की आखो में हल्का पानी है उनकी
पर कुछ कहती नहीं , ना ही वो कहते हैं
बस देखते हैं एक नज़र और भीड़ में ही कहीं गुम हो जाते हैं.
पता नहीं यह इस शहर का तरीका है अपनापन दिखने का
या मेरे माँ बाप का. 

Monday, 13 June 2016


Yun hi..

Chaandni raat mein.. Ghar ki chhat par tehelte huy.. Door se radio par bajte purane gaano ki awaaz ab nahi aati..



Is sheher mein sheher nahi reh gaya.. 
Tum kahi aur baste ho ab shayad..