Monday, 31 December 2018

धुन और धुंध में पता है क्या समानता है?
दोनों में  ही कुछ दिखाई नहीं देता। 

Wednesday, 31 October 2018

मेरे बिस्तर पर जगह है एक तकिया के लिए,
एक खुली पड़ी चादर,
प्रेमचंद की कहानियों के लिए
ग्रोसरी के बिल्स, हेडफोन्स, चार्जर के लिए 
बस नींद के लिए जगह नहीं है।

Monday, 6 August 2018

शमा जल रही है शाम से,
सोच-सोच कर की अँधेरा अब तक आया क्यों नहीं।

Thursday, 28 June 2018

बेपरवाही किसे कहते हैं
उसके पैर पर लगी आधी नेलपॉलिश बताती है.
कोई और क्या रहेगा,
मेरे तो ख्याल भी मेरे पास नहीं रहते। 

Friday, 15 June 2018


kya ittefaq hai, 
subah, dopeher, shaam aur raat
din ke chaar khoobsoorat peher female hain.
kya ittefaq hai?

Almari mein rakhi hain ache se taha kar,
kuch gunjti hui padi hain.
kuch naazuk hain, kareene se rakhi hain,
kuch waqt ke sath ghis gayin, phir bhi samhali hain.
kuch hain kabhi khas mauko par nikalne wali,
kuch rozmarra wali hain.
Sitaron se jadi, kuch nakkashi wali.
kuch ekdum saadi phir bhi khoobsoorat.
Meri almari mein sirf kapde nahin,
kahaniyan hain.

Thursday, 31 May 2018

कबड्डी में हड्डियां तुड़वायीं,
फुटबॉल में भी डब्बा goal था
लूडो में पासा हमेशा उल्टा ही पड़ा
चालबाज़ी आती नहीं तो चेस भी न चला
अब बस शब्दों से खेलते हैं तो खुश हैं।  
दरवाज़े- खिड़की बंद कर के बैठ गए सोफे पे,
सोचा तूफान ही तो है, गुज़र जाएगा।
घर की दीवारों से ज़्यादा मज़बूत उनपे मेरा भरोसा है। 

Friday, 18 May 2018

एक रात सर पर हाँथ फेरा उसने,
बस उस रात से सिरफिरे हो गए हम.

Wednesday, 25 April 2018

दीवार के पार कोई नहीं देख सकता,
दीवार के पार झाँकने के लिए एक खिड़की या कोई दरवाज़ा होना ज़रूरी है.
खिड़की बंद हो तो एक दराज़ होना ज़रूरी है,
दरवाज़े में दीमक की वजह से हुआ कोई छेद  ज़रूरी है.
या फ़िर दीवार से किसी एक ईंट का गायब होना ज़रूरी है.
वरना दीवार के पार कोई नहीं देख सकता।


Tuesday, 10 April 2018

घंटे, दिन, महीने, साल में जी लेते हैं,
अब तो हम किसी भी हाल में जी लेते हैं.